नातेदारी औपचारिता

 

खोमन लाल साहू

शासकीय विश्वनाथ यादव तामस्कर स्नातकोत्तर स्वशाशी महाविद्यालय, दुर्ग

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू ाीवउंदेंीन1010/हउंपसण्बवउ

 

।ठैज्त्।ब्ज्रू

प्रस्तुत शोध पत्र छत्तीसगढ़ के दुर्ग शहर के नागरिकों के अन्दर नातेदारी की वर्तमान स्थिति का अध्ययन किया गया है। आधुनिकिरण के युग में जहाँ हम एक तरफ विकास के विभिन्न आयामों की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं हमारी नातेदारी में सावयवयिता में वृद्धि हो रही है। वर्तमान में ग्रामीणों की अपेक्षा शहरी नागरिकों में नातेदारी (प्राथमिक, द्वितीयक तृतीयक) में औपचारिकता में वृद्धि हो रही है। यह हमारे लिए नैतिकता में बाधा उत्पन्न कर रहा है।

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू जैविकीय, ढाँचा, सन्दर्भित औपचारिक, श्रेष्ठ, निरस, सावयवी।

 

 

 

 

प्रस्तावना:-

मानव सामाजिक प्राणी है। वह जन्म से मृत्यु तक अनेक व्यक्तियों से घिरा होता है अर्थात् उसका सम्बन्ध अनेक व्यक्तियों से होता है, परन्तु इनमें से उसका सर्वाधिक सम्बन्ध उन व्यक्तियों के साथ होता है जो विवाह तथा रक्त सम्बन्ध पारिवारिक आधार पर सम्बन्धित होती है। नातेदारी का आधार सामान्यतः जैविकीय होते हुए भी सामाजिक आधार होता है अर्थात् नातेदारी में सामाजिक मान्यता जैविकीय तत्व पर आरोपित होती है। गोद लिया गया संतान जैविकीय तत्व नहीं होती लेकिन सामाजिक मान्यता द्वारा इससे जैविकीय सम्बन्ध किया जाता है। प्रत्येक समाज नातेदारी सम्बन्धों का ढाँचा प्रस्तुत करता है।

 

अपने नाभिकीय परिवार के बाहर व्यक्ति के द्वितीयक एवं तृतीयक सम्बन्ध होते है। नातेदारी संस्कृति का वह हिस्सा है, जो जन्म और विवाह के आधार पर बने सम्बन्ध एवं सम्बन्ध की अवधारणाओं एवं विचारों से सम्बन्धित होता है। ‘‘डंकन मिचेल’’1-जब हम नातेदारी शब्द का प्रयोग करते है तो हम लोग रक्त-सम्बन्धियों एवं विवाह सम्बन्धियों को सन्दर्भित कर रहे हैं। इस तरह के सम्बन्ध जो विवाह या रक्त सम्बन्धों के कारण होते हैं, नातेदारी सम्बन्ध कहलाते है। वर्तमान में सभी प्रकार के नातेदारी सम्बन्धों में अनौपचारिकता के स्तर में वृद्धि हो रही है। साथ ही लोग केवल अपने लाभ के बारे में सोचने लगे हैं जिससे वे अपने नातेदारों में श्रेष्ठ बनकर रहे। किसी सामाजिक कार्य, उत्सव आदि में सभी नातेदारी में निरसता बढ़ रहा है। जिससे आज नातेदारी कमजोर होते जा रही है।

 

 

 

उद्देश्यः-

1.        नातेदारी का समाजशास्त्रीय विश्लेषण कर वस्तुस्थिति ज्ञात करना।

2.        नातेदारी का सामाजिक एवं पारिवारिक कार्यों में महत्व को ज्ञात करना।

3.        नातेदारी के बढ़ते औपचारिता को ज्ञात करना।

 

उपकल्पना:-

1.        नातेदारी का समाजशास्त्रीय महत्वपूर्ण वस्तुस्थिति होती है।

2.        नातेदारी का सामाजिक एवं पारिवारिक कार्यों में विशेष योगदान होती है।

3.        नातेदारी में औपचारिक विषयमान है।

 

शोध क्षेत्र एवं अध्ययन पद्धतिः-

छत्तीसगढ़ राज्य के दुर्ग शहर को अध्ययन क्षेत्र के रूप में चुना गया है। जिसमें सभी स्तर के व्यक्तियों के सामाजिक कार्यों में जाकर प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से 50 पारिवारिक कार्यक्रमों का चयन किया गया। जिसमें विवाह, जन्मदिन, गृहप्रवेश, मृत्यु आदि विभिन्न कार्यों का अवलोकन किया गया।

 

नातेदारी एवं समाजः-

प्राचीन काल से लेकर वर्तमान तक नातेदारी व्यवस्था का अपना एक विशेष महत्व रहा है, किन्तु इसमें सर्वाधिक संभालने एवं आगे बढ़ाने में महिलाओं की समाज जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है। संगोत्रता, बंधुत्व, स्वजन तथा नातेदारी एक ही अर्थ में प्रयुक्त होता है। ‘‘डिक्सनरी आॅफ एन्थ्रोपोलाॅजी2-नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे सम्बन्ध होता है जो अनुमानित और रक्त सम्बन्धों पर आधारित हो।’’

 

नातेदारी मुख्यतः दो प्रकार की होती है

(1) रक्त सम्बन्ध,

(2) विवाह सम्बन्धी।

 

‘‘नातेदारी में विधिवत् सकुल्पता द्वारा नातेदारी अभिप्रेत है, परन्तु जायज संतार की नातेदारी अपनी माता एवं परस्पर एक-दूसरे से सम्बन्धी जाएगी और उसके वंषज आगे नातेदार हो जाऐंगे।’’3 माॅर्गन पहला विद्वान था जिसने नातेदारी शब्दावलियों के अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान दिया। मरडाॅक ने एक व्यक्ति के लगभग आठ प्राथमिक, तैंतीस द्वितीयक तथा एक सौ इक्यावन तृतीयक नाते दार होंगे। मध्यप्रदेष के भील जनजाति के अध्ययन में अजय सिंह राठौर के अनुसार-‘‘जनजाति में नातेदारी का सम्बन्ध प्रारम्भ में मजबूत होता है किन्तू जैसे-जैसे पीढ़ी आगे बढ़ती है, उसमें निरसता स्वभाविक रूप से आना प्रारम्भ होती है।’’4

 

नातेदारी की विषेषताएँ:-

1.        नातेदारी के माध्यम से विवाह एवं परिवार का निर्धारण

2.        वंश उत्तराधिकार एवं पदाधिकार का निर्धारण

3.        आर्थिक हितों की सुरक्षा

4.        मानसिक संतोश

5.        मानवशास्त्रीय ज्ञान का आधार

6.        सामाजिक दायित्वों का निर्वाह

 

नातेदारी पर आधुनिकता का प्रभाव:-

हमारे समाज में सभी नातेदारी की अपनी विशिष्ट महत्व है तथा व्यक्ति अधिक व्यस्त जीवन यापन कर रहा है। वे अपनी जीवकोपार्जन हेतु अन्य शहरों, राज्यों तथा विदेशों में जाकर कार्य करता है। इसमें व्यक्ति अपनी वास्तविक नातेदारी एवं पारिवारिक सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन अच्छी तरह से नहीं कर पाता है। अक्सर व्यक्ति सभी प्रकार के प्रकार सामाजिक-पारिवारिक कार्यों में अनौपचारिकता को पूरा करता है। इसका प्रभाव बड़े शहरों एवं महानगरों में अधिक देखने को मिल रहा है। जहाँ व्यक्ति प्राथमिक नातेदारी में भी अनौपचारिक सम्बन्धों को निभाता है। ग्रामीण एवं कस्बों पर इसका प्रभाव निम्न है। इससे सभी प्रकार के सम्बन्धों में अपनापन के गुण का अभाव देखने को मिल रहा है।

 

आज वर्तमान समाज में धन समृद्धि वाले नातेदार को अधिक प्राथमिकता दिया जाता है। अधिकांशतः समाज में जिन नातेदार के पास धन या उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती है उसे ही समाज एवं परिवार में विशेष महत्व देते है। इसके जगह पर यदि कोई गरीब नातेदार हो तो उसकी उपेक्षा किया जाता है। पहले की अपेक्षा दूसरे नातेदार को केवल उसकी आर्थिक स्थिति के कारणों से कभी-कभी उपहार का पात्र भी मान लिया जाता है। यदि इसी में प्राथमिक नातेदार में जो परिवार या साथ में रहते है। उसकी अपेक्षा साथ में नहीं रहने वाले व्यक्तियों का सम्मान या पूछ-परख अधिक होती है। उदाहरणस्वरूप जिस नातेदार के पास आर्थिक समृद्धि होती है उसे अधिक सम्मान एवं प्राथमिकता दिया जाता है।

 

निष्कर्षः-

आज नातेदारी का स्वरूप पूर्णता परिवर्तित हो गया है। वर्तमान में व्यक्ति अपने कार्यों में इस प्रकार व्यस्त है कि उसे किसी अन्य नातेदार को जानने या मिलने का समय नहीं है। आधुनिकता इस प्रकार हावि है कि व्यक्ति केवल धन कमाने में लगा है। जिससे व्यक्ति अन्य नातेदारियों के लिए समय नहीं निकाल पा रहा है। इस कारण से नातेदारियों के सम्बन्ध में औपचारिता बढ़ रही है तथा नातेदार कमजोर होते जा रही है। नातेदारों को धन या समृद्धि के रूप में माप तौल कर देखा जा रहा है। ये सभी नातेदार (प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक) में आधुनिकता एवं धन समृद्धि का स्पष्ट का स्पष्ट देखने को मिलता है। यह गाँव की अपेक्षा बड़े शहरों में अधिक प्रभाव है।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूचीः-

1.        भार्गव, उदित ‘‘नातेदारी’’ 02 मई 2010 लेख.

2.        मिश्रा, गोपालशेयो, जनरल नाॅलेज इनसाइक्लोपीडिया, 2009, पृ-179.

3.        हिन्दू मुस्लिम विधि, उपकार प्रकाशन, 2011, पृ.-48.

4.        राठौर, अजय सिंह ‘‘भील जनजाति शिक्षा एवं आधुनिकीकरण’’ 1994. पृ.-66.

 

 

 

 

Received on 18.10.2018                Modified on 15.11.2018

Accepted on 07.01.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(1):64-66.