छत्तीसगढ़ का ग्राम्य समाज (20वीं शताब्दी के विषेष संदर्भ में)

 

डॉ. शबनूर सिद्दीकी

प्राध्यापक, इतिहास शास. पं. श्यामाचरण शुक्ल महाविद्यालय, धरसींवा

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू

 

सांराश:-

छत्तीसगढ़ में 19वीं शताब्दी में सामाजिक और आर्थिक जीवन का इतनी तेजी से परिवर्तन हुआ की जनसाधारण भाग्यवादी बन गये। भौगोलिक संरचना ने प्रदेश को प्राकृतिक सुरक्षा दी और प्रांगण मे ंहमें आदिवासियों की अनोखी रीति-नीति दिखाई दी और जब मैदानी क्षेत्र के लोग मिले तो सभ्यता मिली-जुली हो गई।

 

शब्दकुंजी:-  छत्तीसगढ़, ग्राम्य समाज

 

 

प्रस्तावनाः-

छत्तीसगढ़ के वास्तविक मूल निवासी सघन जंगलो और अंधरूनी क्षेत्र में बसे हैं।भीषण जंगलों में बांस और फूस की झोपड़ियां ही इनके भव्य महल है। गांव लगभग 20-22 झोपडियों के होते हैं और इन झोपड़ियों के प्रायः 3-4 प्रवेश द्वार रहते हैं ताकि अगर 1 द्वार से जंगली पशु आये तो दूसरे द्वार से रक्षा की जा सकें। नरी पुरूष बहुधा घुटनो के बल (उकडू) बैठते हैं। वर्ष दो वर्ष एक स्थान पर रहने के ये अभ्यस्तन हीं होते और वर्ष दो वर्ष पश्चात एक स्थान को छोड़कर दूसरे जन शून्य स्थानों पर झोपड़ियां बनाकर बस जाते हैं (1)

 

 

गांव से लगभग एक मील की दूरी पर देवगुड़ी (देव मंदिर) बनाते हैं इन गुड़ियों में बड़े-बड़े नगाड़े और मयूरों की पूंछ के चंवर रखे जाते हैं।जादू टोनो पर इसकी गहरी आस्था है, रोग दोष से त्रस्त होने पर देव गुड़ियों में पूजा अर्चना करते है और मंदिरों में भेट और बलि चढाते हैं। (2)

 

यहाँ के अवसत ग्रामीण सिर पर पगड़ी और कमर में छोटी धोती पहनते हैं, स्त्रियों की आवश्यकता भी एक लूगड़ा से पूरी हो जाती है। पहले ब्लाउज अथवा पोलका का प्रचलन बिल्कुल नहीं था अब होने लगा है। (3)

 

ग्राम्य जीवन में बर्तन प्रायः पीतल और मिट्टी के होते है पानी पीने का पीतल का बर्तन हौंला कहलाता है और छोटा बर्तन हौंली। खाने बनाने के लिए मिट्टी के चूल्हे है। और सब्जी के लिए लोहे की कढ़ाई या मिट्टी की कनौजी होती है। दाल परोसने के चम्मच को डुआ कहते हैं जो नारियल के खोल का बना होता है और उस पर एक हेंडल होता है। (5)

 

पके चावल को रात को भीगोकर रख दिया जाता है जिसे बासी कहते हैं इसे खेतो में जाने के पूर्व खाया जाता है। इनके लोक गीतों में भी बासी का उल्लेख है। चावल का पका रूप भाग कहलाता है। मछली इन का प्रिय भोजन है। बासी खाने से इन्हें ठण्डक ताजगी और ताकत मिलती है। कन्दमूल फल, मांसाहारकर ये निरन्तर आनन्द पूर्वक दिन बिताते      हैं (6)

 

छत्तीसगढ़ की स्त्रियों मे ंगोदना गोदाने की आम प्रथा है ये काम गोदना वाली पेशेवर देवार स्त्रियां करती है। विवाहित और अविवाहित स्त्रियों एवं लड़कियों का गोदना अलग-अलग डिजाईन का होता है। अविवाहिता होंठो के नीचे बीच में एक बिन्दू या नाक के उपर एक बिन्दू गोद वाती है। जब कि विवाहिता कंधे, बांहों, पैर की पिण्डलियों पर गोदना गोद वाती है। (7)

 

इनके समाज में लोक गीतों और नृत्यों का बड़ा महत्व है। डण्डा, कर्मा, मड़ई, फड़ी, नाचा और रास प्रधान हैं। मड़ई छत्तीसगढ़ का जाति उत्सव है पंथी सतनामी जाति का विशेष नृत्य है। धार्मिक नृत्यों में जवांरा, माता सेवा प्रमुख नृत्य है। आमोद-प्रमोद और मंगल अवसर पर छनद और ताल के समागम की अभिव्यक्ति में यह प्रगट होता है। (8)

 

वनवासी प्रायः वृक्षो ंको काटते उन्हें जलाने जोतने के बजाय राख में बीज बो देते हैं देवताओं को प्रसन्न करने वे परिवार में ही शराब बनाते हैं। (9)

 

प्रकृति के अनुकम्पा के लिए अपार शक्तियां और देवी-देवताओं में श्रद्धा हेतु इनका जीवन पूजा, प्रार्थना और अन्ध विश्वासों से भरा है। जादू टोने पर इनका विश्वास कुछ ज्यादा है। शुभ कार्यो में भेड़, बकरियों की बलि चढ़ाने पर ईष्टदेव प्रसन्न होते हैं यह इनकी मान्यता है। अगर गांव में असमान्य मृत्यू हो गई तो इसका कारण भी वे जादू टोना ही मानते हैं। कुछ जंगल चरगड़ी हुई लाशों को पुनः जगाकर मंत्र साधना से सिद्धि भी करते हैं इसे सामान जगाना कहते हैं। बीज बोना फसल रक्षा फसल काटना, शादी-विवाह, जन्म मृत्यू सभी शक्तियों का स्त्रोत मसानदेव माने जाते हैं। प्रायः तेली के अविवाहित बच्चे ही बाल मसान होते हैं। अतः यहां शीघ्रविवाह प्रचलन है। डिन्डा मसान युवावस्था मे ंमृत अविवाहित पुरूष को कहते हैं। (10)

 

भोज दिवस त्यौहार आदि पर कुछ अधिक खा पीकर ये बहुत शोर करते हैं।

 

1905 के बंग-भंग के पश्चातस्वामी श्रद्धानंद के कार्य से प्रभावित होकर श्री सुंदरलाल शर्मा ने हरिजन उद्धार और अस्पृश्यता निवारण को अपना कार्यक्षेत्र बनाया है, उन्होंने अछूत जाति को सामाजिक समानता हेतु गुरू घासीदास के आदर्शों और कल्याण को अपनाया इसी परिपेक्ष्य में उन्होंने हिन्दू धर्म के अन्तर्गत सतनामी समाज को ब्राम्हणों के समान यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकारी बनाया।

 

17 मार्च 1920 को जातिभेद दूर करने की दिशा में एक बैठक हुई। रायपुर की पुरानी बस्ती की बजरंग मंदिर के हरिजन प्रवेश सबसे पहले हुआ (11)

 

1. 1921-22 में मद्य निषेध को भी नई दिशा मिली क्योंकि मद्य इनके आर्थिक शोषण, नैतिक और चारित्रिक पतन का कारण बन चुका था। अफीन और गांजे की बिक्री पर भी रोक लगाई गई।कांग्रेस कमेटी ने पर्चेवितरित का शराब की बुराई का भी प्रचार किया। (12)

 

20वीं शताब्दी में शैक्षणिक विकास की भी गति विधियां प्रारम्भ हो चुकी थी। निजी और मिशनरी द्वारा स्कूल खोलने के प्रयास किये गये। मिशनरी स्कूलों पर आक्षेप लगने लगे। अतः माधवराव के प्रयासो से रायपुर में जानकीदेवी महिला पाठशाला की स्थापना हुई। (13)

 

सारांशतः छत्तीसगढ़ का जाति और ग्राम्य इतिहास प्राचीनतम है जो विभिन्न संस्कृतियों से मिलकर रचा है। विभिन्न युगों के जाति प्रजातिय लोग यहां आये और सांस्कृतिक परम्परा की धाराएं मिलकर उसका अंग बन गई।

 

संदर्भ स्त्रोतः-

1.     सेंसस ऑफ इण्डिया 1961 वेन्ड्री विलेज सर्वेपृ. 22

2.     रायपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1978 पृ. 126

3.     बिलासपुर गजेटियर 1978 पृ. 127

4.     सेंसस ऑफ इण्डिया 1961 पृ. 22

5.     बलासपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1978 पृ. 125

6.     उत्थान मासिक पत्रिका-संपादक सुंदरलाल त्रिपाठी-सितम्बर 1936 पृ. 499

7.     उत्थान मासिक पत्रिका-1936 पृ. 501

8.     आर बी रसल एवं हीरालाल, ट्राइब्स एंडकास्ट ऑफ दि सेंट्रल प्राविंसेस और इंडिया भाग 1, पृ. 208

9.     हीरालाल शुक्ल-लंका की खोज (दण्कारण्य की सांस्कृति पृष्ठ भूमि) 1977, पृ. 66

10.    दुर्ग डिस्ट्रिक्ट गजेटियर 1909 पृ. 62

11.    श्री केयूर भूषण की निजी डायरी से।

12.    सी.. ट्रिवेलिय नदि एजुकेशन ऑफ दि पिपुल ऑफ इण्डिया वर्ष 1858, पृ. 168

13.    प्यारे लाल गुप्त-बिलासपुर वैभव 1923, पृ. 90-91

 

 

Received on 08.06.2018                Modified on 18.06.2018

Accepted on 29.06.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(2):187-189.