भारतीय राजनीति एवं प्रषासन में महिलाओं की भूमिका

 

डाॅ. (श्रीमति) बी. एन. मेश्राम

(प्राचार्य) प्राध्यापक, राजनीति शास्त्र, शासकीय डाॅ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर

स्नातकोत्तर महाविद्यालय डोंगरगांव, जिला - राजनांदगांव (..)

ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू

 

शोध सारांश:

मनु ने मनुस्मृति में कहा था ’’यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता’’ अर्थात्देवगण ऐसे स्थान पर वास करते हैं, जहाॅं स्त्रियों का सम्मान होता है, शायद इसी भावना के तहत् प्राचीन भारतीय समाज में महिलाओं को विषेष स्थान प्राप्त था। उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था (ईसापूर्व 300 वर्ष पहले) महिलाओं की सामाजिक स्थिति बैदिक काल से ही पतन के कगार पर आना प्रारंभ हो गई, मुगल काल में तो महिलाओं की स्थिति और भी दयनीय हो गई थी। सती प्रथा और पर्दाप्रथा अपने चरम सीमा पर थे, महिलाओं की षिक्षा लगभग समाप्त हो चुकी थी, परिवर्तन के इस युग में हर चीज बदल रही है। बात महिला राजनीति की है, आजादी की लड़ाई के दौरान और स्वतंत्रता के दौर में राजनीतिक पटल पर कई महिलााऐं आयी और अपनी छाप छोड़ गई लेकिन सफल महिला राजनीतिज्ञों की संख्या कम है। महिला को राजनीतिक प्रषिक्षण दिया जाना आवष्यक है। राजनीतिक जागरूकता अति आवष्यक है जिससे राजनीति प्रषासन में महिला अधिक से अधिक अपना योगदान दे सके।

 

ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू राजनीति, प्रषासन

 

 

 

 

 

 

 

 

 

प्रस्तावनाः-

महिलाओं को इस क्षेत्र में आगे आने के लिए निम्न परिस्थितियां महिलाओं के लिए आवष्यक है-

(1) षिक्षा

(2) समानता (स्त्री/पुरूष)

(3) महिला आरक्षण

(4) सामाजिक सम्मान

(5) सुरक्षा नियमों का कड़ाई से पालन

 

इन सभी बातों से महिलाओं को आगे बढ़ने में सहयोग प्राप्त होगा।

 

भारत में विभिन्न कालों में महिलाओं की स्थिति दयनीय ही रही है, बात महिला राजनीति की है, आजादी की लड़ाई के दौरान और स्वतंत्रता के बाद के दौर मे राजनीतिक पटल पर कई महिलायें आई और अपनी छाप छोड़कर चली गई, लेकिन सफल महिला राजनीतिज्ञों की संख्या लगभग नगण्य है। समुची दुनियां सहित भारत का राजनीतिक पटल भी लगभग महिला बिहीन ही है, आज के राजनीतिक प्रधान समाज में किसी भी वर्ग का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बहुत मायने रखता है। महिलाओं को चैके से संसद तक लाने की बातें तो बहुत होती है, लेकिन उसकी जिन्दगी घर, परिवार चुल्हे चैंके और ग्लैमर आर्टिकल तक ही सिमटी रहती है।

 

महिलायें केवल माता, पत्नि या बेंटियां ही नहीं है, वे समाज के जिम्मेदार नागरिक भी है। किसी भी राष्ट्र को बड़ा बनाने में उनका बहुत बड़ा हाथ होता है। भारतीय समाज में महिलाओं को देवी का स्थान दिया जाता है, लकिन आये दिन देखने में आता है कि महिलाओं के साथ अत्याचार और शोषण बहुत अधिक हो रहे हैं, यह शोषण शारीरिक और मानसिक सभी तरह का होता है। ऐसे स्थिति में हम कैसे विष्वास करें कि महिला का स्थान देवी के समान है। महिला को देवी कहने वाले लोग ही उसका शोषण करने से हिचकते नहीं है।

 

जिस समाज में महिलाओं का शोषण होगा वह समाज कभी विकास नहीं कर सकेगा क्योंकि समाज का विकास करने के लिए महिलाओं को साथ लेकर चलना जरूरी है, जैसे कोई भी परिवार महिला और पुरूष के साथ-साथ चलना आवष्यक है।

 

भारतीय समाज पुरूष प्रधान होने से पुरूष अपने आप को श्रेष्ठ मानता है और नारी को अपनी तुलना में तुच्छ ही समझता है, इस प्रकार की मानसिकता को बदलना आवष्यक है। वर्तमान समय में षिक्षा का विकास होने के कारण और महिलाओं के षिक्षित होने के कारण स्थिति में परिवर्तन दिखाई देता है, क्योंकि महिलायें षिक्षित होकर परिस्थितियों का सामना करना सीख गई है। अपने अधिकारेां और शक्तियों को पहचानने लगी है, इसलिए राजनीति में आकर पुरूष के साथ देष के विकास में अपने को भागीदार बनाना चाहती है, लेकिन इसमें पूरी तरह वह सफल नहीं हैं, क्योंकि राजनीति मं आने के लिए जिस तरह के हथकंडे पुरूष अपनाता है उसे नारी नहीं अपना सकती, जिससे आज नारियों को समान सहभागिता नहीं मिल पाई है। मनी, मसल्स और मैंन पावर के कारण लोगों का चुनाव पर विष्वास डगमगाने लगा है इस चुनावी प्रवृत्ति का सबसे बुरा असर महिलाओं की राजनीतिक हैसियत पर पड़ा है।

 

आज हम पंचायत स्तर पर पाते हैं कि महिलाओं को आरक्षण देकर गांव की और शहरों की राजनीति तक स्थान तो अच्छा मिला है, लेकिन वहां भी कई दोष पाये गये हैं जिससे उसे पुरूष के अधीन की कार्य करना पड़ रहा है अगर हम राज्यों की विधान सभी संसद में देखें तो वहां पर भी महिला का स्थान नगण्य है।

 

महिलाओं को 33 प्रतिषत आरक्षण देने की बात कई सालों से की जा रही है लेकिन आज तक वो विधेयक पारित नहीं हुआ है, वह विधेयक कब संसद की दहलीज पार कर पायेगा यह आज तो लोक सभा को पता है और ही सरकार को। सामाजिक राजनीतिक और अन्य कार्य क्षेत्रों में महिलाओं के सामने आने वाले मुष्किलों को दूर करने वाली बात कहीं जाती है उसका हल भी निकाला जाता है, लेकिन उसका पालन नहीं किया जाता है। समाज को इस ओर ध्यान देना चाहिए कि ऐसा क्यों होता है ?

 

महिला की स्थिति के बारे में कहा जाता है कि चुनाव में तथा रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़े हुए प्रष्नों पर अपने राय जाहिर करने की तरह ही राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी में एक क्रमिक वृद्वि के बावजूद राजनीतिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की सामथ्र्य अभी तक महिलाओं के पास नहीं है, इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति का कारण राजनीतिक दलों और महिलाओं की संख्या बहुत कम पायी जाती है। हमारा आधुनिक भारतीय समाज आज भी राजनीति में महिलाओं के लिए समान प्रतिनिधित्व की सिद्वांत को अपनाने में हिचकिचा रहा है, जिस कारण से महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं बढ़ पा रही है।

 

आज भारत में महिलायें सभी क्षेत्रों में रही है। वे अपने मेहनत लगन के बल पर सभी क्षेत्रों में सफलता के झण्डे गाड़ रही है, तो फिर राजनीति के क्षेत्र में पीछे क्यों हो रही है? इतिहास और वर्तमान गवाह है कि भारतीय महिलाओं ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुरूषों के वर्चस्व को तोड़ा है और कई क्षेत्रों में तो पुरूषों से भी अधिक प्रभावी भूमिका है, लेकिन वे राजनीति के क्षेत्र में पुरूषों के मुकाबले बहुत पीछे भी छुट गई है। महिलाओं को समान वैधानिक राजनीतिक अधिकार दिये जाने चाहिए तभी भारत की आजादी सार्थक हो पायेगी।

 

राजनीति मे महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी और सत्ता में उनकी समान हिस्सेदारी के बिना हमारी आधुनिकता, विकास और सभ्यता, सब कुछ बेमानी है, इसलिए राजनीति में महिलाओं की पर्याप्त भागीदारी के लिए समाज के सभी वर्गों को प्रयास करने होंगे। सभी लोगों को अपने जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा।

 

एक ओर राजनीति महिलाओं कीे कमी को तो झेल ही रही है, दूसरी ओर आम भारतीय महिलायें भी राजनीतिक रूप से अक्रियाषील ही है। वे विभिन्न स्तरों के चुनाव में मतदान तो करती हैं, लेकिन उनका मत अधिकतर उसी उम्मीद्वार को जाता है जिससे उसके पुरूष रिष्तेदार चाहते हैं। वास्तव में महिलायें अपने मताधिकार का तो उपयोग करती हैं, लेकिन पारिवारिक बंधनों के चलते वे अपने राजनीतिक अधिकारों का सहीं तरीके से उपयोग नहीं कर पाती।

 

राजनीतिक दल महिला आरक्षण के हिमायती तो है और वे महिलाओं को राजनीतिक रूप से जागरूक और क्रियाषील बनाने की जरूरत पर बल देते हैं, लेकिन हकीकत कुछ और ही दिखाई देती है। राजनीतिक दल महिलाओं को राजनीति में भागीदार और सत्ता के हिस्सेदार की वकालत तो करते हैं लेकिन व्यवहार में उनकी कार्यप्रणाली बिल्कुल उलट है, यही कारण है कि महिला उम्मीद्वार को तो अधिक टिकट ही दिये जाते हैं, और नहीं उन्हें संगठन में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जाती है।

 

लेकिन अब स्थिति बदलने वाली है क्यों कि महिलायें राजनीतिक रूप से धीरे-धीरे जागरूक हो रही हैं। वे राजनीति में भागीदारी और सत्ता में हिस्सेदारी और सत्ता में हिस्सेदारी चाहती हैं इसलिए तो मेघा पाटकर, अरूंधती राय, वंदना षिवा और अरूणा राय जैसी महिला राजनीतिज्ञों की जमात उभाकर सामने लाना चाहती है।

 

पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 33 प्रतिषत आरक्षण देते समय हमारे पुरूष प्रधन समाज के प्रतिनिधि अच्छी तरह जानते थे कि इन चुनाव में जो महिलायें विजय प्राप्त करने के बाद सत्ता में भागीदारी निभाने को आगे आयेंगी, तो उनमें से अधिकतर वे महिलायें होंगी जो अषिक्षित और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय होगी तथा परंपरागत रूप से पुरूषों की मुठ्ठी में कैद हांेगी और उन्हें कठपुतली की भांती अपने इषारे पर नचाना आसान होगा, और यह बात वैसे ही हुई जैसा पुरूष प्रधान व्यवस्था ने सोंचा था। पुरूषों ने पंचायती राज व्यवस्था में घेरलु महिलाओं को इसलिए जाने दिया कि वे पदासीन होतेहुए भी पुरूषों के चंगुल से बाहर जाने वाली नहीं थी, किन्तु वे महिलाओं को दिल्ली और अन्य प्रांतों की राजधानियों में भेजना इसलिए पंसद नहीं करते क्योंकि उन्हें महिलाओं के अपने हाथ से निकल जाने का डर है।

 

आज नहीं तो कल संसद में महिला आरक्षण विधेयक पारित हो जायेगा लेकिन प्रष्न ये उठता है कि आम भारतीय महिला वास्तव में चाहती क्या है? क्या सिर्फ समाज में समानता का अधिकार? समानता का आधार पर पुरूषों जैसा मान-सम्मान, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए राजनीतिक अधिकार और आरक्षण तो जरूरी है ही, लेकिन साथ ही आवष्यकता है पुरूषों की रूढ़ीवादी सोंच में मौलिक बदलाव लाने की। पुरूष प्रधान राजनीतिक व्यवस्था में परिवर्तन करने की और महिलाओं को हीन भावना से उबाकर राजनीतिक रूप से जागृत करने की हमें अपनी विधायिका में सषक्त राजनीतिज्ञ चाहिए कि डमी और कठपुतली राजनीतिज्ञ जो पुरूषों के इषारें पर चलते रहें इसलिए जरूरी है कि विधायिका में महिलाओं को आरक्षण देने के साथ-साथ उन्हें राजनीतिक रूप से जागरूक भी किया जाए ताकि वे सच्चे अर्थों में राजनीतिक भागीदारी पा सके, स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय ले सके और देष के लिए सार्थक काम कर सके। महिला का आत्म सम्मान देष को विकास की ओर शीघ्र ही पहुंचा देगा।

 

पूरी दुनियां में आज महिला आन्दोलन का शोर है उन्हें विभिन्न प्रकार के अधिकार दिये जाने की बात की जा रही है। महिला सषक्तिकरण पर जोर भी दिया जा रहा है, लेकिन फिर भी स्थिति जैसी की वैसी ही है। महिलाओं को राजनीतिक रूप से सक्षम और सक्रिय कैसे बनाया जाये इस पर समाज और शासन को चिंतन करना चाहिए। महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाया जाना भी उनकी राजनीतिक स्थिति में सुधार का एक लक्षण माना जा सकता है।

 

देष को आजाद हुए आज कई साल हो गये हैं जिसमें स्व. इंदिरा गांधी को छोड़कर जितने भी महिलायें राजनीति में आई है वे राजनीतिक रूप में डमी ही साबित हुई है। जब महिला किसी महत्वपूर्ण पद पर पहुंचती है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वे आम महिलाओं की बेहतरी के लिए कुछ खास करेगी लेकिन ये उच्च कुल महिला रानीतिज्ञ ऊंचे पद पर पहुंच कर अन्य महिलाओं के दर्द को दूर करना चाहती है तो उसे अन्य लोगों का सहयोग पूरी तरह नहीं मिल पाता है। महिला पर अत्याचार की घटनाऐं बड़ रही है, महिला सांसद एक शब्द नहीं बोल पाती है, इस बदहाली का एकमात्र कारण है कि महिलाओं की राजनीतिक चेतना में कमी।

 

अब इस स्थिति को बदला जाना आवष्यक है। महिलाओं को राजनीतिक प्रषिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे पुरूष रिष्तेदारों के हाथों की कठपुलियां बनी रह जाये।

 

विधायिका में 33 प्रतिषत आरक्षण जरूरी है, राजनीतिक जागरूकता अति आवष्यक है। महिलाओं के राजनीतिक परिवेष को बदलने के लिए कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है, जैसे महिलाओं को राजनीतिक रूप से क्रियाषील बनाया जाये, स्वस्थ सकारात्मक सामाजिक संरचना का निर्माण आर्थिक आत्मनिर्भरता और पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सहज बनाया जाये। समुचित षिक्षा की व्यवस्था की जाये, नारी के प्रति सोचनें समझने का नजरियां बदला जाये और उसे पूरी सुरक्षा दिया जाना चाहिए।

 

प्रतिनिधि संस्थाओं में उसे सहभागी बनाया जाये, राजनीतिक दलों महिला संगठनों का दायित्व उन्हें सौंपा जाये और अगर काई भी व्यक्ति महिला के साथ दुव्र्यहार करता है तो उसे कड़ी सजा दी जाये।

संदर्भः-

1.     भारतीय शासन राजनीति:- डाॅ.बी.एल.फाड़िया

2.     सामाचार पत्रों के लेख - नवभारत

3.     पत्रिका - मनोरमा

 

 

 

 

 

Received on 04.08.2018                Modified on 21.08.2018

Accepted on 30.09.2018            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2018; 6(4): 531-534.