महिला सशक्तिकरण दशा एवं दिशा

 

श्रीमती पूनम साहू1’, डाॅ वासुदेव साहसी2

1शोध छात्रा, इतिहास अध्ययन शाला, पं.  रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर (छ..)

2शोध निर्देशक, शा. जे योगानंदन छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर (छ.)

 

सारांश-

भारतीय समाज में आज भी महिलाओं को लेकर दोहरे मापदण्ड हैं। एक तरफ तो उन्हें पूजनीया, सरस्वती, लक्ष्मी जैसी उपमाएॅ देता है तो दूसरी तरफ उनका शोषण करने में भी पीछे नहीं रहता है। भारत में महिला अस्मिता और उसकी सुरक्षा, अधिकारों और सम्मान को लेकर आन्दोलन हुए हैं, परन्तु उन्हें पुरूष समाज की ओर से जितना समर्थन मिलना चाहिए नहीं मिला। घर परिवार और समाज में वाजिब सम्मान के लिए उसे लम्बा संघर्ष करना पड़ता है। बाहर एवं घर परिवार में हो रही हिंसा को मिटाए बिना समाज में महिला सशक्तिकरण का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता है। नये आर्थिक पर्यावरण के उद्भव, नई राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना, आधुनिक शिक्षा पद्धति और चिन्तन शैली के प्रसार आदि के फलस्वरूप भारत में महिला सशक्तिकरण का आरंभ हुआ ।

 

महिला का स्थान प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण रहा है। महिला को ही सृष्टि रचना का मूल आधार कहा गया है। महिलाएॅ समाज का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक अंग है क्योंकि विश्व की आधी जनसंख्या तकरीबन इन्हीं की है। महिलाएॅ आज भी पूरी तरह सशक्त नहीं हुई हैं, इसका सबसे बड़ा कारण आए दिन होने वाली तमाम घटनाएॅ हैं, जिसमें वे तरह-तरह की हिंसा का शिकार हो रही हैं। बाहर तो वे हिंसा का शिकार होती है साथ ही अपने परिवार के पु़़़रुष और दूसरी महिला सदस्यो के द्वारा भी उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। बाहर एवं घर परिवार मे हो रही हिंसा को मिटाए बिना समाज में महिला सशक्तिकरण का स्वप्न कभी पूरा नहीं हो सकता है।(1)  महिला सशक्तिकरण का अर्थ है, महिलाओं में आत्म सम्मान, आत्म निर्भरता व आत्मविश्वास जागृत करना है। महिला सशक्तिकरण के लिए वर्तमान में सबसे बड़ी आवश्यकता उनको अपने अधिकारों एवं कर्तव्यो के प्रति सजग होने की है। यदि कोई महिला अपने अधिकारों एवं कर्तव्यो के प्रति सजग और आत्मनिर्भर है, तो उसका आत्मसम्मान अवश्य ऊॅचा होगा और वे देश कि विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

 

कोई भी राष्ट्र तभी विकास कर सकता है, जब उसकी लगभग आधी आबादी जो कि महिलाओं की है, को आर्थिक, सामाजिक, राजनितिक, शैक्षणिक व धार्मिक आदि समस्त क्षेत्रों में सशक्त किया जाए। अरस्तू के शब्दों में ‘‘किसी भी राष्ट्र की स्त्रियों की उन्नति व अवनति पर ही उस राष्ट्र की उन्नति व अवनति निर्भर है। (2) महिलाओं का समर्थ होना निरन्तर विकास की बुनियाद है। समर्थ होने पर ही महिलाएं अपने जीवन की सभी पहलुओं पर पूरा नियत्रंण पा सकती है। अतएव जब उनके जीवन और आजीविका के भौतिक आधार को सुदृढ नही किया जाता तब तक महिलाएं समर्थ नही हो सकेंगी। (3)समाज के सन्दर्भ में नारी की स्थिति युगानुयुग परिवर्तनशील बनी रही है। नारी की महत्ता और गौरव एवं उसका वर्चस्व और गरिमा कभी उच्च से उच्चतर हो रही है, तो कभी उसमें ह्रास परिलक्षित होता है। एक सा स्वरूप उसका कभी नही रहा। आज नारी की जो सामाजिक और स्थिति है। कल वैसी न थी, यह अन्य बात है, कि नारी अपनी विद्यमान अवस्था को अतीत की अपेक्षा उन्नत मानती है। (4)

 

प्रत्येक रूप में नारी की भाॅति भाॅति की पात्रता अभिनीत करनी पड़ती है। चूंकि आज की नारी का कार्यक्षेत्र परिवार तक ही सीमित नही रह गया है। उसे अपने कार्यस्थल पर भी अनेक रूपों में अपना दायित्व भली-भाॅति निर्वहन करना पड़ता है। इस प्रकार एक ही नारी को एक ही दिन में कई प्रकार की भूमिका निभानी पड़ती हैै। आजकल की कामकाजी नारी के रूप में अत्यधिक विस्तृत हो चुके है। अतः स्पष्ट है, कि नारी शक्तिरूपा है, जगत जननी है। नारी के संबध में यहा तक कहा गया है, कि उसमें पृथ्वी के समान क्षमा सूर्य के समान तेज, समुद्र के समान गंम्भीरता, चन्द्रमा के समान शीतलता एवं पर्वत के समान उच्चता के दर्शन होते है। अस्तु कहा जा सकता है कि युग चाहे जो भी हो संसार की तरक्की नारी के विकास पर ही आधारित है। (5) समाज में जब तक नारी को उचित आदर प्राप्त नही होगा उसका विकास सम्भव नहीं, उसके विचार में नारी को एैसी स्थिति में लाना होगा जहां वह अपने समस्याओं को अपने तरीके से समाधान स्वंम कर सके और भारत की नारी ऐसा करने में उतनी ही समर्थ है। जितनी विश्व की अन्य देशों की महिलाएं। भारत में इंदरा गांधी और अहिल्याबाई जैसे निर्भिक नारी की परम्परा को जारी रखना होगा। नारी शिक्षा को विस्तार और धर्म को केन्द्रीय स्थान देकर इसका चरित्र निर्माण और बम्हचर्य रक्षा में दूर तक प्रभाव पडे़गा। (6)

 

शिक्षा महिला सशक्तिकरण में सबसे मुख्य भूमिका शिक्षा निभा सकती है। शिक्षा मनुष्य के आचार विचार व्यवहार सभी में परिवर्तन कर देती है। शिक्षा स्त्रियों के सर्वागीण विकास, समाज की चर्तुभुजी उन्नति और सभ्यता की बहुमुखी विविध क्षेत्रों में परिवर्तन कर देती है। शिक्षा महिला सशक्तिकरण में मील का पत्थर साबित हो सकती है। महिला शिक्षा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार हेतु सुझाव देने के लिए 1958 में देशमुख समिति का गठन किया गया, इस समिति ने महिला शिक्षा के विस्तार हेतु अनेक उपाय बताए। इसके बाद महिला शिक्षा के संबंध में पुनः विस्तार से सुझाव देते हुए 1962 में हंसा मेहता समिति का गठन किया। इसके बाद कोठारी आयोग (1964-66) ने स्त्री पुरूषेां के लिए भिन्न भिन्न पाठ्यक्रमांे का सुझाव दिया। साथ ही कोठारी आयोग ने प्रथम 10 वर्षीय शिक्षा हेतु आधारभूत पाठ्यचर्चा प्रस्तुत की। इसका प्रभाव यह हुआ कि भिन्न भिन्न प्रांतो में स्त्री-शिक्षा को भिन्न-भिन्न रूप में संगठित किया गया । इन सब विशेषताओं को पूरा करने के लिए 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति की घोषणा की गई। शिक्षा में कोई भेद नही ंकिया जाएगा नारी को पुरूषों के समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार होगा इसके अलावा स्त्रियों को विज्ञान, तकनीकी और मैनेजमेंन्ट की शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। (7) 2 अक्टूबर 1964 को शिक्षा आयोग के उद्घाटन भाषण में श्री एमसी. छागला (तत्कालीन केन्द्रीय शिक्षा मंत्री) ने भी संकेत किया था - ‘‘एक शिक्षित नारी का प्रभाव चमत्कारी होता है और उसका प्रभाव समाज पर प्रभावकारी होता है। अतः महिला शिक्षा बहुत ही आवश्यक है।’’

 

महिला सशक्तिकरण हेतु सरकारी प्रयास

1.     1 नवंबर 1999 में प्रारंभ पढ़ना-बढ़ना आंदोलन अत्यधिक सफल रहा। इस योजना के अंतर्गत एक निरक्षर को पुनः साक्षर करने पर 100 रू. गुरू दक्षिणा का प्रावधान था, वह कारगर साबित हुआ।

2.     निरक्षर महिलाओं को साक्षर बनाने के लिये यथासंभव स्थानीय स्तर पर उपलब्ध शिक्षित स्वयं-सेवकों  को दायित्व सौंपा गया।(8) 

3.     महिलाओं के नवसाक्षर होने के बाद उनके सशक्तिकरण की दिशा में महिला स्व-सहायता समूहों के गठन को बढ़ावा दिया गया। साक्षरता अभियान के माध्यम से अब तक राज्य में लगभग 2-3 हजार महिला व सहायता समूह विभिन्न जिलों में गठित किए जा चुके हैं।(9)

4.     अनुसूचित जाति/जनजाति तथा पिछड़े वर्ग की बालिकाओं, विशेषतः गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों की बालिकाओं को निःशुल्क/यथासंभव न्यूनतम शुल्क पर शिक्षा सुलभ कराना।

5.     व्यावसायिक एवं व्यवसायोन्मुखी परामर्श एवं प्रशिक्षण (जो केवल महिलाओं पर केन्द्रित हो) का आयोजन ताकि वे अपनी योग्यताओं एवं रूचियों के अनुरूप पाठ्यक्रमों का चयन कर सकें।(10)

6.     महिलाओं के नवसाक्षर होने के बाद उनके सशक्तिकरण की दिशा में महिला स्व-सहायता समूह के गठन को बढ़ावा दिया गया। साक्षरता अभियान के माध्यम से इब तक राज्य में लगभग 2-3 हजार महिला स्व-सहायता समूह विभिन्न जिला में गठित किये जा चुके हैं।

7.     महिलाओं को आर्थिक स्वावलंबन प्रदान करने के लिए उनके निजी बचत खाते, बैंको, डाकघरों में खोलने को प्राथमिकता दी गई।(11)

8.     साक्षरता अभियान क्रियान्वयन से जुड़ी जिला स्तर से लेकर ग्राम स्तर से लेकर ग्राम स्तर तक की समस्त समितियों में महिलाओं की भागीदारी 30-35 प्रतिशत तक सुनिश्चित की गई।

9.     आकाशवाणी रायपुर, अम्बिकापुर, जगदलपुर, बिलासपुर के समय-समय पर महिला साक्षरता को सफल बनाने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का प्रसारण किया गया।(12)

10.    शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में नैतिक मूल्य (मूल्य आधारित) शिक्षा के समावेश हेतु आवश्यक उपाय किये गये।

11.    शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में छत्तीसगढ़ राज्य की महिला विभूतियों एवं महिलाओं से संबंधित सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक आख्यानों को सम्मिलित करना।

12.    बालिकाओं को वैज्ञानिक व तकनीकी शिक्षा दिये जाने हेतु प्रोत्साहन।(13)

13.    1 जनवरी 1997 से पूरे प्रदेश में शिक्षा गारंटी योजना शुरू की। इस योजना का सफल क्रियान्वयन हो इसका जिम्मा पंचायती राज व्यवस्था को सौंपा गया। पंचायती राज्य व्यवस्था द्वारा किये गये प्रयासों से प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन आए।(14)

 

आज हम सभी स्व इंदिरा गांधी को लौह नारी के रूप में स्मरण करते है। बैंको का राष्ट्रीयकरण और बंगलादेश का निर्माण यह इंदिरा गांधी जैसी सशक्त नारी की देन है। आज देश के प्रथम नागरिक ‘‘राष्ट्रपति’’ के रूप में श्रीमाती प्रतिभा पाटिल रह चुकि है, कांग्रेस की सत्ता संगठन को सम्हालने वाली अध्यक्ष सोनिया गांॅधी है भाजपा में सशक्त वक्ता सुषमा स्वराज है। दिल्ली में शिला दीक्षित मुख्य मंत्री के पद पर   है । उ0प्र0 में सुश्री मायावती मुख्य मंत्री का दयित्व निभा चुकि है। समाज सेवा, शिक्षा, खेल, कला एवं अन्य क्षेत्रों में अब छत्तीसगढ़ की भी नारियाॅ आगे आ रही है। (15)

 

महिलाओ का सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान है, इनके बिना परिवार या समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। परिवार एवं समाज में इनका योगदान अतुलनीय है। महिलाए समाज व परिवार की मार्गदर्शक हैं, युवा पीढी की सफलता की श्रोताधार हैं, परिवार की पथ प्रदर्शक हैं । अविष्कारी मस्तिष्क तो नारी के पास सदैव रहा है। परन्तु समय के साथ-साथ मस्तिष्क इस प्रकार के विचार करने पर विराम लगा दिया अब उन्हे इस अविष्कारी विचार को पुनः प्रारम्भ करना होगा एवं अपने द्वारा उत्पन्न समाज को फिर से उन्हे राह बताना होगा। तभी समाज में समानता आएगी । (16) ं     

 

संदर्भ सूची -

1.     अंसारी एम.., महिला और मानवाधिकार, जयपुर, 2007 पृ 224

2.     सिंह गौरव,महिला सशक्तिकरण हेतु सरकारी प्रयास एवं संवैधानिक व्यवस्थाये, आन्वीक्षिकी (शोधपत्रिका), 2013, पृ. 64,

3.     टी. राधाकृष्ण, मध्यप्रदेश महिला नीति भेपाल, 1997, पृ. 11,14,

4.     आचार्य सम्राटश्री देवेन्द्रमुनी जी, भारतीय वाडमय में नारी, नई   दिल्ली, 2006 पृ. 24,

5.     श्रीवास्तव रागिनि, आधुनिक समाज एवं महिलाएं इंदौर, 2011, पृ.       21,

6.     जसटा हरिराम, आधुनिक भारत में शैक्षिक चिन्तन, दिल्ली 1992, पृ.    21

7.     पूर्वोक्त, पृ 65

8.     मेहता, बी.के, और दुबे, राकेश कुमार, शोध संप्रेषण बिलासपुर, 2004,   पृ. 18,

9.     सुरजन, ललित, संदर्भ छत्तीसगढ़, रायपुर, 2004, पृ. 114,

10.    पूर्वोक्त, पृ. 22,

11.    वही

12.    सूरजन ललित, पूर्वोक्त, पृ. 114

13.    मेहता, बी.के, और दुबे, राकेश कुमार, पूर्वोक्त, पृ. 114

14.    वही

15.    हरिभूमि, 25 मार्च, 2010, पृ.10

16.    पाण्डे मनोज कुमार, नारी साम्राज्य, विश्वभारती प्रकाशन , 2008 पृ.     120

 

 

Received on 12.11.2013          Modified on 25.11.2013

Accepted on 15.12.2013         © A&V Publication all right reserved

Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 1(2): Oct. - Dec. 2013; Page 57-59